बनारसी साड़ियों का कारीगर

बहुत समय पहले की बात है बनारस शहर में मोहन नाम का बनारसी साड़ियों का कारीगर रहता था वह अपनी कला में बड़ा निपूण था उसे साड़ियों की बुनाई के ढेरों आर्डर आते थे वह साड़ियों की बुनाई में दिन रात लगा रहता था उसके अंदर हर रोज कुछ नया सीखने की अजीब चाहत थी | सच तो यह है कि जो गुण मोहन के अंदर था वह गुण किसी भी व्यक्ति को महान एवं कामयाब बना सकता है|

बनारसी साड़ियों

फलस्वरूप उसे अच्छे परिणाम मिलने लगे उसकी दुकान की हालत अब पहले से काफी अच्छी हो गई थी दुकान के साथ-साथ उसका गृहस्थ जीवन भी सुखमय था| उसके परिवार में माता-पिता एवं पत्नी रहती थी जल्द ही उनके परिवार में एक खुशी आने वाली थी दरअसल उनकी पत्नी मां बनने वाली थी बच्चे के आने की खुशी में सभी लोग मोहन और उसकी पत्नी को ढेरों शुभकामनाएं देते है |                                                                                                         उनके ही पड़ोस में एक व्यक्ति था जो पेशे से बनारसी साडियों का ही कारोबारी था , लेकिन वह मोहन एवं उसके परिवार से बहुत जलन करता था| उनका कारोबार अच्छा चल रहा था उसी दौरान उसकी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया जिस से चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियां छा गई थी| धीरे-धीरे वह बच्चा बड़ा होने लगता है देखते ही देखते बच्चा 1 साल का हो जाता है मोहन आज अपने बेटे का सालगिरह बहुत धूमधाम से मनाता है चारों तरफ छोटे-छोटे बल्ब लगवाता है मानो पुरे घर में तारे उतर आए हो घर में मेहमानों के आने का सिलसिला भी शुरू हो चुका होता है                                                                                                                                                                                                                 |मोहन की पत्नी एवं अन्य सभी मेहमान एक जगह जमा होते हैं जहां पर मोहन के बेटे को केक कटाया जाता है और उसके केक पर उसके दादाजी ने उसका नाम सोहन लिखवाया होता है तभी दादा जी सभी सदस्यों के बीच एक अनाउंसमेंट करते हैं आज मैंने अपने पोते का नाम सोहन रखा है क्योंकि मेरे बेटे का नाम मोहन है तो उसके बेटे का नाम मैंने सोहन रखा है, इतना कहकर दादा जी हंसने लगते है उन्हें देखकर वहां मौजूद सभी लोग भी हंसने लगते है| इधर पूरा परिवार खुशी में डूबा था उधर उनका पड़ोसी एक साजिश तैयार करता है खाने के पंडाल में पीछे से जाकर आग लगा देता है |जिससे चीजों की पूरी छती होती है लोगों में अफरा-तफरी मच जाती है लोग जान बचाकर इधर-उधर भागने लगते हैं तभी मोहन चंद आदमियों के साथ मिलकर आग को बुझा लेता है उसके बाद धीरे-धीरे जाकर परिएस्थिति ठीक होती है

ठीक ही कहते हैं जब ऊपरवाला किसी का भला चाहता है तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता मोहन अपने परिवार के लोगों के साथ बहुत ही खुशी खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहा था साथ ही उसका बेटा धीरे-धीरे अब बड़ा होने लगा था| देखते ही देखते जीवन के धुप और छाव के बीच वे जीवन के 20 साल व्यतीत कर चुके होते हैं और उनका बेटा अब बड़ा हो जाता है                                                                                                                         | जैसा कि एक कारोबारी परिवार का चलन होता है बेटा बाप के कारोबार को आगे बढ़ाता है ठीक उसी तरह मोहन का बेटा सोहन भी पढ़ाई के साथ-साथ अपने पिता के बनारसी साड़ियों की दुकान पर जाया करता था | धीरे-धीरे वह बनारसी साड़ियों की बुनाई में महारत हासिल कर लेता है | लोग सोहन के बुने हुए बनारसी साड़ीयों की बहुत तारीफ करने लगे | सोहन अपने परिवार में अकेला संतान था इसी कारण उसे सभी लोग बहुत प्यार करते थे | अत्यधिक लाड और प्यार में वह थोड़ा बिगड़ सा गया था लेकिन बनारसी साड़ियों के बुनाई में उसे महारत हासिल हो गई थी                                                                                                                                                                                                            | थोड़ा बहुत जो कमी होता उसे उसके पिता जी सुधार देते, जिससे उसके बनारसी साड़ियों की मांग बढ़ गई धीरे-धीरे मोहन की आंखें कमजोर होने लगी अब काम का पूरा भार सोहन पर था उसके पिता सिर्फ उसके कमियों को बताया करते थे जिसमें वह सुधार कर लेता था | परिणाम स्वरूप उसकी बनारसी साड़ियों की बुनावट अच्छी होने लगी | इससे उसके काम में बहुत तरक्की होने लगी |इन सबके बीच मोहन के अंदर थोड़ा घमंड का भाव पैदा हो गया था उसे यह महसूस होने लगा के पिताजी जब दुकान पर बैठते थे उस वक्त से दुकान अभी ज्यादा अच्छा कारोबार कर रहा है|                                                                                                                                                                                         एक दिन एक ग्राहक साड़ियों के आर्डर देने आता है और अपनी साड़ियों की बुनाई के लिए सैंपल भी दे जाता है मोहन साड़ियों की बुनाई उसके सैंपल के अनुसार कर देता है पिताजी ने जब यह देखा तो उन्होंने इसमें कुछ सुधार करने को बोला यह बात सोहन को बहुत बुरी लगी वह पिताजी को हर वक्त हर बात में टोकने के लिए मना किया और उसने कहा वह अपना काम करना जानता है आप चुपचाप घर पर बैठे |                                                                                                                                                                                                                            इस बात से उनके पिताजी बहुत दुखी हुए पर उन्होंने अपने बेटे को कुछ नहीं कहा और सीधे वे घर चले गए इधर सोहन अपने दुकान में दिन रात तरक्की करने लगा यह देख उनका पड़ोसी अंदर ही अंदर बहुत जलने लगा उसे उनकी कामयाबी देखी नहीं गई| एक रात वह मोहन की दुकान में आग लगा देता है आग की खबर पाते ही मोहन अपने बेटे के साथ दूकान पर पहुचता है | यह सब देखकर मोहन के आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है और वह जमीन पर गिर पड़ता है |                                                                                                                                    तभी सोहन दौड़ा हुवा वहां आता है और अपने पिता को संभाल कर पास पड़े मेज पर बैठता है उसके बाद पानी से अपने दुकान कि आग को बुझाता है | अब तो दुकान के नाम पर तो सिर्फ राख ही बचा होता है यह सब देख कर दोनों बाप बेटे के आंखों में आंसू आ जाता हैं | लेकिन वे हिम्मत नहीं हारते और अपने हौसले और जमा पूंजी से दुकान फिर से शुरू करते हैं |                                                                            अब बाजार में फिर से पहले वाला मुकाम पाना मुश्किल था पर वे हिम्मत नहीं हारते है , दिन रात मेहनत कर अपने कारोबार को फिर से वही मुकाम तक पहुंचते है | इससे वे दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगे लेकिन इन सबके बीच अभी भी वह अपने पिताजी को महत्व नहीं देता था क्योंकि उसे अपने पिता की कमी निकालने की आदत पसंद नहीं थी और यही बात उसके लिए नुकसानदायक साबित हुई |                                                                                                                                                                                                                          धीरे-धीरे उसकी साड़ियों की बुनाई की खूबसूरती खत्म होने लगी जिस कारण उसके साड़ियों के आर्डर भी कम आने लगे जिसका असर उसके दुकान और घर दोनों पर दिखाई देने लगा| इन सब से परेशान होकर सोहन को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हुआ| एक दिन वह अपने पिता जी के पास जाता है और अपनी समस्या के बारे में बताता है साथ ही साथ वह शर्मिंदा भी होता है और अपने पिताजी से अपने किए पर माफी मांगता है|                                                                                                                                                सोहन के पिता जी अपने बेटे की बात सुनकर मुस्कुराते हैं और यह बोलते हैं कि” बेटा जो तुम्हारी कमियों के बारे में बताएं उससे नाराज और दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि उसे अपने पास रखना चाहिए क्योंकि जो आप की कमियों के बारे में बताता है दरअसल वही आपका असल शुभचिंतक होता है”|
तो बच्चों हमने इस कहानी से यह सीखा कि जो कोई भी हमारी गलतियों को बताता है उससे हमें सीख लेनी चाहिए और अपनी गलतियों को सुधारना चाहिए ना कि उन्हें अपने से दूर करना चाहिए | बल्कि उन्हें हमेशा अपने पास रखना चाहिए||

 

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